Bollywood: फिल्में जिन्होंने समाज को दिखाई नई दिशा

भारतीय समाज एक तरफ जहां ओलंपिक खेलों में पहलवानी का पदक लाने वाली Mirabai Chanu की तारीफ़ करता है, वहीं दूसरी तरफ इसी समाज का एक तबका, लड़कियों को कमज़ोर मान कर किसी भी काम के लायक नहीं समझता. देश के कई हिस्सों में आज भी, बेटियों को घरेलू हिंसा और असम्मान जैसी कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है. इसके अलावा भी कई रूढ़िवादी अवधारणाएं हमारे समाज के एक हिस्से को दीमक की तरह खोखला करने में लगी हुईं हैं. हालांकि, जहां सामाजिक जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से कई संस्थाएं भारत में काम करती हैं, वहीं हमारा Bollywood भी जागरूकता फैलाने के मामले में कभी पीछे नहीं रहता.

Bollywood का सामाजिक विषयों पर फ़िल्म बनाने का सिलसिला काफ़ी पुराना है. इसका एक उदाहरण है साल 2000 की Bollywood फ़िल्म Kya Kehna. फिल्म में एक लड़की को शादी से पहले गर्भवती होने पर समाज की कितनी ठोकरें खानी पड़ती हैं और इन सब को सहकर, आखिरकार कैसे वह समाज से लड़कर अपने बच्चे को जन्म देती है, यही इस फ़िल्म में दिखाया गया था. पुरुषतांत्रिक समाज में हमेशा महिलाओं को गलत ठहराने की रूढ़िवादी सोच ही इस फ़िल्म के ज़रिए दिखाई गई. इसके बाद से ही हिंदी सिनेमा में इतने सालों में Aligarh, Lipstick Under My Burkha, Shubh Mangal Zyada Saavdhan जैसी कई ऐसी Bollywood फिल्में बनीं, जिन्होंने सामाजिक विषयों का चित्रण फ़िल्म के ज़रिए किया. लेकिन आज हम 5 ऐसी फिल्मों के बारे में बात करेंगे, जिनमें दिखाई गई रूढ़िवादी अवधारणाओं से हमारा आए दिन सामना होता है.

1. Mardaani (2014) 

बेहद अफसोस की बात है, कि कहीं न कहीं भारतीय समाज आज भी महिलाओं को कमज़ोर समझता है. महिलाएं चाहे कितने ही बड़े पद पर क्यों न पहुंच जाएं, उन्हें अक्सर अपने ही कार्यविभाग की रूढ़िवादी सोच का सामना करना पड़ता है. इसी सोच को कुछ हद तक बदल पाने के उद्देश्य से आई थी, Bollywood निर्देशक Pradeep Sarkar की फ़िल्म Mardaani. अभिनेत्री Rani Mukherjee ने इसमें एक महिला पुलिस अफसर का किरदार निभाया था. यह अफसर अपने दम पर, बच्चों के अवैध व्यापार के गोरख धंधे का खुलासा करती है. फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर काफ़ी सफल रही थी.

2. Toilet: Ek Prem Katha (2017)

प्रधानमंत्री Narendra Modi के ‘‘स्वच्छ भारत अभियान’ से हम सब अच्छी तरह वाकिफ हैं. उनके इस अभियान से राजनेता से लेकर कई अभिनेता भी जुड़े हुए हैं. इस महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा को एक कदम और आगे लेकर गए बॉलीवुड के ‘खिलाड़ी’ यानी Akshay Kumar. इसी अभियान पर आधारित साल 2017 की Bollywood फ़िल्म Toilet: Ek Prem Katha दर्शकों को काफ़ी पसंद आई. अपनी पत्नी के लिए घर में शौचालय बनाने को लेकर हीरो के संघर्ष पर ही फ़िल्म की कहानी बनी है. आज भी देश में ऐसे कई लोग हैं, जो अब भी यह मानते हैं की रसोई, मंदिर और शौचालय एक ही घर में नहीं हो सकते. ऐसे घरों की महिलाओं को अक्सर खेतों में शौच की समस्या का सामना करना पड़ता है. इसी पिछड़ी सोच पर आधारित है ये फिल्म.

3. Padman (2018)

अगर कोई लड़की किसी मेडिकल की दुकान पर जाकर दुकानदार से सैनिटरी पैड मांग ले, तो आसपास की सभी नज़रें अचानक से उसकी तरफ केंद्रित हो जाती हैं. माहवारी एक ऐसा विषय है, जिसको लेकर अभी भी समाज सीधे मुंह बात करने तक को राज़ी नहीं है. वहीं देश की तरक्की के इस दौर में आज भी कई गांव ऐसे हैं, जहां अब तक महिलाओं के लिए माहवारी संबंधित सुविधाएं पहुंच नहीं पाती हैं. इन मिथकों को लेकर समाज में जागरूकता के उद्देश्य से, ‘हैप्पी टू ब्लीड’ या ‘नियन आंदोलन’ जैसे कई प्रयास किए जाते हैं. वहीं इस कार्य में बॉलीवुड भी कहां पीछे रहने वाला था? साल 2018 में आई Bollywood निर्देशक R. Balki की फ़िल्म Padman के ज़रिए Akshay Kumar ने भी इस विषय पर जागरूकता फैलाने का प्रयास किया. उनकी ये फ़िल्म असल जीवन के Padman, Arunachalam Muruganantham के जीवन पर आधारित थी.

4. Article 15 (2019)

भारतीय समाज में ऊंच-नीच और जातिगत भेदभाव एक ऐसी समस्या है, जिसे लाख प्रयत्नों के बाद अब भी जड़ से उखाड़ फेंकना मुमकिन नहीं हो पाया है. हमारे संविधान के अनुच्छेद 15 के अनुसार, किसी भी भारतीय नागरिक से उसके धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर कोई भेद भाव नहीं किया जा सकता है. इसके बावजूद हमें आए दिन, खबरों में जातिगत हिंसा या असम्मानजनक हादसे देखने और सुनने को मिलते हैं. समाज के इसी पहलू पर बनी है, Anubhav Sinha की फ़िल्म Article 15. फ़िल्म में Bollywood अभिनेता Ayushmann Khurrana ने मुख्य भूमिका निभाई थी. उनके साथ फ़िल्म में Sayani Gupta, Manoj Pahwa और Kumud Mishra जैसे सहायक कलाकार भी मौजूद थे.

5. Thappad (2020)

हमारे पुरुषवादी समाज में महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा की घटनाएं काफ़ी आम सी बात है. “अगर पति की बात मान कर नहीं चलेगी, तो पति हाथ तो उठाएगा, हक है उसका”. इसी रूढ़िवादी सोच पर करारा Thappad जड़ा, Bollywood निर्देशक Anubhav Sinha ने. एक ऐसा विषय, जिसपर कोई भी बात नहीं करना चाहता, उस मुद्दे पर यह फ़िल्म बना कर कहीं न कहीं निर्देशक ने एक चर्चा की शुरुआत ज़रूर की. वहीं Taapsee Pannu की इस फ़िल्म के किरदार अमृता ने सभी महिलाओं के लिए एक मिसाल कायम करने की कोशिश की. फ़िल्म में Bollywood अभिनेत्री के प्रदर्शन को काफी सराहा गया. साथ ही फिल्म को कई पुरस्कारों से भी नवाज़ा गया.

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