Indian Politicians: वे नेता जिन्होंने जेल में रहते लड़ा चुनाव⁩

सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीति से अपराधियों को दूर रखने के लिए सदस्यता खत्म होने के साथ ही कई कड़े कानून बनाए है. हालांकि, देखा जाए तो यह सिर्फ कानून की किताबों तक ही सीमित है. सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में कहा था कि आपराधिक मुकदमों में दोषी करार सांसदो, विधायकों को निचली अदालत में दोषी करार दिए जाने के साथ ही उन Politicians की सदस्यता रद्द कर दी जाएगी. मगर इन फैसलों पर अमल होना बाकी है.

आज इस बात का जिक्र इसलिए किया जा रहा है क्योंकि उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर लोकसभा सांसद Asaduddin Owaisi ने अपनी पार्टी को और से अपराधिक मामलों में लिप्त और जेल में बंद Politicians Mukhtar Ansari को टिकट देने की घोषणा की है. सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार के जबी कोई अपराधी जेल से मतदान नही कर सकता तो है तो चुनाव लड़ने की अनुमति कैसे दी जा सकती है.

आइए जानते हैं उन Politicians के बारे में जिन्होंने जेल में रहते लड़ा चुनाव 

1. Akhil Gogoi 

असम के Gogoi किसान नेता के रूप में पहचाने जाते हैं. वे पहले ऐसे Politician हैं, जिन्होंने जेल में रहते चुनाव लड़ा और भारी मतों से जीत हासिल की. Akhil Gogoi को यूएपीए के तहत हिरासत में लिया गया था, उनपर फिलहाल राजद्रोह का मुकदमा चल रहा है. राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने Akhil पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के खिलाफ हुए हिंसक आंदोलन में भाग लिया था. सामाजिक कार्यकर्ता Akhil ने असम विधानसभा चुनावों में शिवसागर सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा, उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की उम्मीदवार सुरभि राजकुंवर को 11,875 मतों के बड़े अंतर से हराया.

Akhil को इस साल जुलाई में 567 दिनों के बाद रिहा किया गया था. हालांकि, Akhil ने इन सभी आरोपों को नकार दिया था और कहा कि ईडी और सीबीआई का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है. साथ ही उन्होंने कहा, सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वालों को गलत तरीके से हिरासत में लिया जा रहा है. 

2. Kameshwar Baitha 

अक्सर कहा जाता है कि अगर किसी अपराधी को ही फैसला सुनाने या लोगों की सेवा के लिए संसद में बिठा दिया जाए तो जनता की कैसे सेवा होगी. ऐसा ही कुछ देखने को मिला है Kameshwar Baitha के मामले में. पलामू के सांसद Kameshwar baitha पर 48 से अधिक संगीन मामलें दर्ज है. Baitha ने जेल में झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) पार्टी के चिन्ह पर चुनाव लड़ा था और जीत हासिल की.

राजनीति में कदम रखने से पहले Baitha नक्सली संगठन से जुड़े हुए थे. चुनाव से ठीक पहले आचार संहिता उलंघन के कारण उन्हें हिरासत में लिया गया था. हालांकि, मतदाताओं को इससे कुछ खास फर्क नही पड़ा और Baitha ने अपने प्रतिद्वंदी घूरन राम को भारी मतों से हराया. 

3. Anand Mohan Singh 

कहते है बिहार की राजनीति में दो चीजे चलती है एक है जाति और दूसरी है दबंगई. ऐसे ही एक Politician ने दोनो का सहारा लेते हुए बिहार की राजनीति में अपना कदम रखा. 

Anand Mohan और छोटन शुक्ला की काफ़ी गहरी मित्रता थी. 1994 में छोटन शुक्ला की अंतिम यात्रा में Anand Mohan भी पहुंचे थे, उसी दौरान एक लालबत्ती गाड़ी गुजर रही थी, जिसमें उस समय गोपालगंज के कलेक्टर जी कृष्णैया मौजूद थे. लालबत्ती की गाड़ी देखकर भीड़ में आक्रोश फैल गया और गुस्साई भीड़ ने कलेक्टर को पीट पीट कर मार डाला. जांच में यह पाया गया की Anand Mohan के कहने पर यह कृत्य हुआ था, और निचली अदालत ने उन्हें मौत की सजा सुना दी. 1996 में लोकसभा चुनाव हुए, उस वक्त आनंद जेल में थे. उन्होंने समता पार्टी के चिन्ह पर शिवहर से चुनाव लड़ा और भारी मतों से जीत हासिल की. 

4. Mukhtar Ansari 

भाजपा के विधायक कृष्णानंद की हत्या के जुर्म में Mukhtar Ansari को सलाखों के पीछे भेजा गया था. कृष्णानंद राय, मोहम्मदाबाद सीट से विधायक थे उन पर 29 नवंबर 2005 को एके 47 से 47 गोलियां चलाई गई थीं. Mukhtar को जेल में भी एक अलग बैरक में रखा गया था. हाल ही कुछ महीनों पहले Mukhtar को पंजाब से उत्तर प्रदेश शिफ्ट किया गया था. हालांकि, हत्या और डकैती जैसे संगीन अपराधों के बावजूद भी Mukhtar कई सालों से चुनाव लड़ रहे है. बीजेपी को छोड़कर उत्तर प्रदेश की हर बड़ी पार्टी से चुनाव लड़ा और विधानसभा में अपना कदम रखा. 

राजनीतिक दल क्यों देते हैं टिकट

चुनाव के समय हर राजनीतिक दल जनता की सुरक्षा और संरक्षा की गारंटी देता है. लेकिन अगर अपराधिक गतिविधियों से लिप्त Politicians को ही टिकट दिया जाए तो कैसे कोई जानता की सुरक्षा करेगा. दरअसल, ग्रामीण इलाकों में मजबूत पकड़ और पैसों के बाहुबल पर राजनीतिक दल इन Politicians को चुनाव लड़ने का मौका देती है. 

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